अनकहा

(1)  अजीब इक़्त्फाक है की तुम , मेरी बातो से इक़्त्फाक रखते हो

(2) हो कही तो बता दो मुझको , मेने हर जगह से तुम्हे मिटाने की कोशिश की है

(3) तुम अपनी मुस्कुराहट को मासूम कहती हो , जाने कितने जख्म मेने खाये हे इससे |

(4) पूरे होंगे तब बताऊँगा तुम्हे , कुछ ख्वाब जो पाले थे मेने मेरी आंखो मे |

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जिसको जाना है वो बेशक जाये

Analyser/Observer जितनी गुज़रनी थी, गुज़र गई सुकून और सब्र के साथ, आधी से ज़्यादा उम्र तय कर ली है अपने दम पर। अब न किसी को मनाने की चाह बची है...