अर्जी

गुनहगार हु तेरा 
 सजा दे - दे 
बाद तेरे जीने की मुझको
कोई तो वजह दे - दे 
चाहते अपनी सारी मै 
खोलकर सामने रख  दूँगा
तु आने की अपने दिल मे 
फिर से मुझको रजा दे - दे
तडप क्या होती है 
मोहब्बत से बिछडने की 
जान गया हु मै 
तु फिर से अपनी बाहो कि 
मुझको पनाह दे - दे 
कबूल सारे गुनाह मेरे 
आज मुझ पर ही भारी है 
तु अपनी शानो - शौकत की
मुझ पर थोडी सी निगाह दे - दे |

अर्जी 

2 comments:

  1. बहुत ही उम्दा...बहुत ही सुन्दर रचना

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