उम्मीद

मुसाफिर की राह मे
मंजर कुछ बडा है इस तरह
पाँवो मे जूते है फिर भी काँटा चुभा हे इस तरह
ये विराना अंधकार और ठंडी हवाये चल रही कुछ इस तरह
हे उम्मीद की बसंत की बहार आयेगी इस बार कुछ इस तरह |

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जिसको जाना है वो बेशक जाये

Analyser/Observer जितनी गुज़रनी थी, गुज़र गई सुकून और सब्र के साथ, आधी से ज़्यादा उम्र तय कर ली है अपने दम पर। अब न किसी को मनाने की चाह बची है...