शहर

कभी तो इस शहर की आबो - हवा  को छू जा ,
कि काश तेरे छूने से गुल्सन मे गुल खिल जाये |

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जिसको जाना है वो बेशक जाये

Analyser/Observer जितनी गुज़रनी थी, गुज़र गई सुकून और सब्र के साथ, आधी से ज़्यादा उम्र तय कर ली है अपने दम पर। अब न किसी को मनाने की चाह बची है...