साथी

अब जब तुम आते नहीं 
लोग गाते नहीं 
गुनगुनाते नहीं 
और महफ़िलो मे रंग भी नहीं चढ़ता 

अब जो तुम मुस्कुराते नहीं 
इठलाते नहीं 
बलखाते नहीं 
नाचते नहीं 
नचाते नहीं 
तो अब महफ़िलो मे रंग भी  चढ़ता 

हमसे बतियाते नहीं 
सुनते भी नहीं 
सुनाते भी नहीं 
कहते भी नहीं 
कहलवाते भी नहीं 
तो अब महफ़िलो मे रंग भी नहीं चढ़ता 

झूलते भी नहीं 
झुलाते भी नहीं 
सोते भी नहीं 
सुलाते भी नहीं 

रोते भी नहीं 
रुलाते भी नहीं 
तो अब महफ़िलो मे रंग भी नहीं चढ़ता | 



2 comments:

  1. बहुत खूब लिखा आप ने 👌👌👌
    पर आप की कविता का रंग तो खूब चढा 😊
    बहुत सरल पर सुन्दर रचना 👏👏👏

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद नितु जी आपके सुंदर शब्दो के लिये अपना साथ युही बनाए रखे

      Delete

जिसको जाना है वो बेशक जाये

Analyser/Observer जितनी गुज़रनी थी, गुज़र गई सुकून और सब्र के साथ, आधी से ज़्यादा उम्र तय कर ली है अपने दम पर। अब न किसी को मनाने की चाह बची है...